नीलाम कर देंगे
कवि: अदम गोंडवी
सदन को घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे अगली योजना में घूसख़ोरी आम कर देंगे
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है

काव्य-विधाएँ
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कवि: अदम गोंडवी
सदन को घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे अगली योजना में घूसख़ोरी आम कर देंगे
मगर यह वक़्त घबराए हुए लोगों की शर्म आँकने का नहीं और न यह पूछने का— कि संत और सिपाही में देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है!
कवि: कैफ़ी आज़मी
बोझ से अपने उस की कमर झुक गई क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो ज़िंदगी का हो कोई जिहाद वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा
वहाँ न जंगल है न जनतंत्र भाषा और गूँगेपन के बीच कोई दूरी नहीं है। एक ठंडी और गाँठदार अंगुली माथा टटोलती है। सोच में डूबे हुए चेहरों और वहां दरकी हुई ज़मीन में कोई फ़र्क नहीं हैं।
कवि: शमशेर बहादुर सिंह
राह तो एक थी हम दोनों की आप किधर से आए गए हम जो लुट गए पिट गए, आप तो राजभवन में पाए गए
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में आग लगी हो तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों तो क्या तुम दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो? यदि हाँ तो मुझे तुम से कुछ नहीं कहना है।
कवि: कुंवर नारायण
मैंने कई भाषाओँ में प्यार किया है पहला प्यार ममत्व की तुतलाती मातृभाषा में… कुछ ही वर्ष रही वह जीवन में:
कवि: भवानीप्रसाद मिश्र
बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले, उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले उनके ढंग से उड़े,, रुकें, खायें और गायें वे जिसको त्यौहार कहें सब उसे मनाएं
कवि: सुमित्रानंदन पंत
मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे, सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे, रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी और फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूँगा! पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा, बन्ध्या मिट्टी नें न एक भी पैसा उगला!- सपने ज...
क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है। बिन अदालत औ मुवक्किल के मुकदमा पेश है। आँख में दरिया है सबके दिल में है सबके पहाड़ आदमी भूगोल है जी चाहा नक्शा पेश है। क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।
कवि: सुभद्राकुमारी चौहान
परिमल-हीन पराग दाग़-सा बना पड़ा है हा! यह प्यारा बाग़ ख़ून से सना पड़ा है
कवि: पराग पावन
वे स्त्रियाँ याद आती हैं जो निमंत्रण की तरह आयी थीं और त्यौहारों की तरह चली गयीं जिनकी आवाज़ में कास के फूल झूमते थे?
कवि: अंकिता रासुरी
‘अनवांटेड 72’ प्रेम के नाम पर रात दिन सड़ती-गलती मेरी ज़िंदगी मेरा शरीर ख़तरनाक स्थिति तक टूटता रहा कंपनियाँ कभी नहीं कहतीं कि यह दवा नहीं एक धीमा ज़हर है
कवि: निर्मला पुतुल
तुम कहते हो मेरी सोच ग़लत है चीज़ों और मुद्दों को देखने का नज़रिया ठीक नहीं है मेरा
कवि: नेहा नरुका
जिसने अकाल देखा हो वह थोड़ा-सा गेहूँ हमेशा बचाकर रखता है बेशक, उस गेहूँ में घुन लग गया हो, पर फिर भी अकाल देख चुका व्यक्ति उस गेहूँ को फेंकता नहीं वह अपना ज़रूरी समय घुन बीनने में गँवाता है वह इन्तज़ार करता है खिलकर आई ध...
कवि: अदम गोंडवी
कभी आकर जिले में आप सामंती ठसक देखें कहा जाता है यू.पी. में न राजा है न रानी है
कवि: विहाग वैभव
अल्लाह के बाग़ान में जिन्हें उधम कर दौड़ जाना था अगले आँगन वे बम से फटी सड़क पर गला फाड़ रोते हुए अपनी माँ के चिथे स्तन चूम रहे हैं
कवि: सुमित्रानंदन पंत
सुन्दर हैं विहग, सुमन सुन्दर, मानव! तुम सबसे सुन्दरतम, निर्मित सबकी तिल-सुषमा से तुम निखिल सृष्टि में चिर निरुपम! यौवन-ज्वाला से वेष्टित तन, मृदु-त्वच, सौन्दर्य-प्ररोह अंग, न्योछावर जिन पर निखिल प्रकृति, छाया-प्रकाश के र...
कवि: केदारनाथ अग्रवाल
धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने मैके में आई बेटी की तरह मगन है फूली सरसों की छाती से लिपट गई है, जैसे दो हमजोली सखियाँ गले मिली हैं भैया की बांहों से छूटी भौजाई-सी लहँगे की लहराती लचती हवा चली है सारंगी बजती है खेतों की...
कवि: साहिर लुधियानवी
ख़ून अपना हो या पराया हो नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर जंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब में अम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर
कवि: नागार्जुन
बाल ठाकरे ! बाल ठाकरे ! कैसे फ़ासिस्टी प्रभुओं की -- गला रहा है दाल ठाकरे ! अबे सँभल जा, वो पहुँचा बाल ठाकरे !
कवि: मनीष कुमार यादव
एक समय था सृष्टि में हर ओर शबनम व्याप्त थी भगवान और अल्लाह नहीं थे तब भी वहाँ पर्याप्त थी उसके होने से ही तो पहले वहाँ इंसान आए फिर ख़ुदा-भगवान आए और फिर झगड़े हुए पिछलों से भी तगड़े हुए
कवि: नेहा नरुका
बच्चे खेल रहे थे, उन्हें लगा यह भी कोई नया खेल है वे भी भागने लगे भागते भागते मर्द आगे निकल गए बच्चे पीछे रह गए
कवि: विहाग वैभव
प्रिय आयोजक! उपकृत कर देने के दंभ से लबालब आपका कविता पाठ का निमंत्रण मिला शुक्रिया, पर क्षमा करें नहीं आ सकूँगा, अक्षम हूँ
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है