धूप
कवि: केदारनाथ अग्रवाल
धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने मैके में आई बेटी की तरह मगन है फूली सरसों की छाती से लिपट गई है, जैसे दो हमजोली सखियाँ गले मिली हैं भैया की बांहों से छूटी भौजाई-सी लहँगे की लहराती लचती हवा चली है सारंगी बजती है खेतों की...
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है

परिचय
प्रगतिशील काव्य-धारा के प्रमुख कवि केदारनाथ अग्रवाल (1911–2000) अपनी यथार्थवादी और जनसरोकार से जुड़ी कविताओं के लिए जाने जाते हैं। पेशे से वकील रहे केदारनाथ जी की रचनाओं में प्रकृति-प्रेम और शोषित वर्ग के प्रति गहरी सहानुभूति दिखाई देती है। उन्हें 'केन का कवि' भी कहा जाता है।
कविताएँ
कवि: केदारनाथ अग्रवाल
धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने मैके में आई बेटी की तरह मगन है फूली सरसों की छाती से लिपट गई है, जैसे दो हमजोली सखियाँ गले मिली हैं भैया की बांहों से छूटी भौजाई-सी लहँगे की लहराती लचती हवा चली है सारंगी बजती है खेतों की...
किताबें
इस कवि की कोई किताब अभी अभिलेख में उपलब्ध नहीं है।