ऐ शरीफ़ इंसानों
कवि: साहिर लुधियानवी
ख़ून अपना हो या पराया हो नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर जंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब में अम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है

परिचय
साहिर लुधियानवी बीसवीं सदी के प्रमुख प्रगतिशील उर्दू-हिंदी शायर और विख्यात गीतकार हैं। उनकी रचनाएँ सामाजिक चेतना, शांति और मानवीय संवेदनाओं को मुखर करती हैं।
कविताएँ
कवि: साहिर लुधियानवी
ख़ून अपना हो या पराया हो नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर जंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब में अम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर
किताबें
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