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शहर में सूर्यास्त

सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'

उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है

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धूप

कवि: केदारनाथ अग्रवाल

धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने

मैके में आई बेटी की तरह मगन है

फूली सरसों की छाती से लिपट गई है,

जैसे दो हमजोली सखियाँ गले मिली हैं

भैया की बांहों से छूटी भौजाई-सी

लहँगे की लहराती लचती हवा चली है

सारंगी बजती है खेतों की...

धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने

मैके में आई बेटी की तरह मगन है

फूली सरसों की छाती से लिपट गई है,

जैसे दो हमजोली सखियाँ गले मिली हैं

भैया की बांहों से छूटी भौजाई-सी

लहँगे की लहराती लचती हवा चली है

सारंगी बजती है खेतों की गोदी में

दल के दल पक्षी उड़ते हैं मीठे स्वर के

अनावरण यह प्राकृत छवि की अमर भारती

रंग-बिरंगी पंखुरियों की खोल चेतना

सौरभ से मँह-मँह महकाती है दिगंत को

मानव मन को भर देती है दिव्य दीप्ति से

शिव के नंदी-सा नदिया में पानी पीता

निर्मल नभ अवनी के ऊपर बिसुध खड़ा है

काल काग की तरह ठूँठ पर गुमसुम बैठा

खोई आँखों देख रहा है दिवास्वप्न को

मूल भाषा: Hindi

© केदारनाथ अग्रवाल

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