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शहर में सूर्यास्त

सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'

उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है

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पहलगाम

कवि: मनीष कुमार यादव

अपने मन की नींव टटोलो

किसने किसको मारा बोलो

अपने मन की नींव टटोलो

किसने किसको मारा बोलो

लहू बहाया किस हसरत से

प्राण हरे तो किस मकसद से

देखो ऐसी बात है भाई

हर मत में है कुछ दंगाई

अपने हक़ की बात समझ लो

इनसे अपनी नहीं भलाई

इनका जामा-पगड़ी-टोपी

इनके मत्थे इनकी थाती

चाहे सीमा पार खड़े हों

चाहे भीतर चौड़ी छाती

धर्म-युद्ध का ढोंग रचाते

मूल्यहीन सब इनकी बातें

इस सत्ता का मर्म यही है

बुद्धिहीन सब इनकी गाते

दॉंव तो अपना देना होगा

इसका बदला लेना होगा

दृढ़ता से जब कदम बढ़ेंगे

अपना पंजा पैना होगा

पर पंजे पर ध्यान लगाना

सही जगह सामर्थ्य दिखाना

एक पल भी आवेश में आकर

अपनों पर मत तीर चलाना

ऐसे तो हद हो जाएगी

टांग कुल्हाड़ी को जाएगी

आतंकी जो चाह रहे सब

हालत वैसी हो जाएगी

वे तो चाह रहे हैं क्लेश

जन-जन बांट रहे हैं द्वेष

ऐसी राहों पर चलकर तो

अपना कुछ न रहता शेष

अपना ऐसा बाना नाहिं

समता भाव मिटाना नाहिं

उस रस्ते की कीमत ऐसी

मर जाना पर जाना नाहिं

घोर ग्रहण है बात सही है

पर यह दिन है रात नहीं है

अपने देश का गरिमा-भंजन

उनके बस की बात नहीं है

ओ! मिट्टी के राज-दुलारों

तन्मयता से सोच-विचारो

अपने जन में प्रेम बढ़ाकर

दुर्जन पर एक-स्वर धिक्कारो

भगत-सुभाष ने खून से अपने

जिस भारत की सोच जनी थी

नेहरू-गांधी-पटेल-भीम ने

जिस भारत की नींव रखी थी

उस भारत की साख बचा लो

उस भारत की लाज बचा लो

उस भारत का काज बचा लो

उस भारत को आज बचा लो

मूल भाषा: Hindi

© मनीष कुमार यादव

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