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शहर में सूर्यास्त

सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'

उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है

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देशगान

कवि: सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।

बिन अदालत औ मुवक्किल के मुकदमा पेश है।

आँख में दरिया है सबके

दिल में है सबके पहाड़

आदमी भूगोल है जी चाहा नक्शा पेश है।

क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।

क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।

बिन अदालत औ मुवक्किल के मुकदमा पेश है।

आँख में दरिया है सबके

दिल में है सबके पहाड़

आदमी भूगोल है जी चाहा नक्शा पेश है।

क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।

हैं सभी माहिर उगाने

में हथेली पर फसल

औ हथेली डोलती दर-दर बनी दरवेश है।

क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।

पेड़ हो या आदमी

कोई फरक पड़ता नहीं

लाख काटे जाइए जंगल हमेशा शेष हैं।

क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।

प्रश्न जितने बढ़ रहे

घट रहे उतने जवाब

होश में भी एक पूरा देश यह बेहोश है।

क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।

खूँटियों पर ही टँगा

रह जाएगा क्या आदमी ?

सोचता, उसका नहीं यह खूँटियों का दोष है।

क्या गजब का देश है यह क्या गजब का देश है।

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