शहर में सूर्यास्त
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है

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उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है
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मैं भी मरूंगा और भारत के भाग्य विधाता भी मरेंगे लेकिन मैं चाहता हूं कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें
कवि: सुभद्राकुमारी चौहान
परिमल-हीन पराग दाग़-सा बना पड़ा है हा! यह प्यारा बाग़ ख़ून से सना पड़ा है
कवि: पराग पावन
वे स्त्रियाँ याद आती हैं जो निमंत्रण की तरह आयी थीं और त्यौहारों की तरह चली गयीं जिनकी आवाज़ में कास के फूल झूमते थे?