शहर में सूर्यास्त
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है

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उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है
संबंधित पाठ
कवि: अदम गोंडवी
सदन को घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे अगली योजना में घूसख़ोरी आम कर देंगे
मगर यह वक़्त घबराए हुए लोगों की शर्म आँकने का नहीं और न यह पूछने का— कि संत और सिपाही में देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है!
कवि: कैफ़ी आज़मी
बोझ से अपने उस की कमर झुक गई क़द मगर और कुछ और बढ़ता रहा ख़ैर-ओ-शर की कोई जंग हो ज़िंदगी का हो कोई जिहाद वो हमेशा हुआ सब से पहले शहीद सब से पहले वो सूली पे चढ़ता रहा
वहाँ न जंगल है न जनतंत्र भाषा और गूँगेपन के बीच कोई दूरी नहीं है। एक ठंडी और गाँठदार अंगुली माथा टटोलती है। सोच में डूबे हुए चेहरों और वहां दरकी हुई ज़मीन में कोई फ़र्क नहीं हैं।
कवि: शमशेर बहादुर सिंह
राह तो एक थी हम दोनों की आप किधर से आए गए हम जो लुट गए पिट गए, आप तो राजभवन में पाए गए
कवि: कुंवर नारायण
मैंने कई भाषाओँ में प्यार किया है पहला प्यार ममत्व की तुतलाती मातृभाषा में… कुछ ही वर्ष रही वह जीवन में:
कवि: भवानीप्रसाद मिश्र
बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले, उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले उनके ढंग से उड़े,, रुकें, खायें और गायें वे जिसको त्यौहार कहें सब उसे मनाएं
कवि: सुमित्रानंदन पंत
मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे, सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे, रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी और फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूँगा! पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा, बन्ध्या मिट्टी नें न एक भी पैसा उगला!- सपने ज...
कवि: सुभद्राकुमारी चौहान
परिमल-हीन पराग दाग़-सा बना पड़ा है हा! यह प्यारा बाग़ ख़ून से सना पड़ा है
कवि: पराग पावन
वे स्त्रियाँ याद आती हैं जो निमंत्रण की तरह आयी थीं और त्यौहारों की तरह चली गयीं जिनकी आवाज़ में कास के फूल झूमते थे?