कुंवर नारायण (1927–2017) आधुनिक हिंदी साहित्य के मूर्धन्य कवि और विचारक थे। उनकी काव्य-दृष्टि में इतिहास, मिथक और समकालीन मानवीय नियति का गहरा दार्शनिक समन्वय मिलता है।
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' (1936–1975) साठोत्तरी हिंदी कविता के अत्यंत सशक्त और जनपक्षधर कवि थे। अपनी तीखी राजनीतिक चेतना और बेबाक शैली के लिए विख्यात धूमिल ने 'संसद से सड़क तक' जैसे संग्रहों के माध्यम से समकालीन समाज और राजनीति के अंतर्विरोधों पर गहरा प्रहार किया। उन्हें मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
प्रगतिशील काव्य-धारा के प्रमुख कवि केदारनाथ अग्रवाल (1911–2000) अपनी यथार्थवादी और जनसरोकार से जुड़ी कविताओं के लिए जाने जाते हैं। पेशे से वकील रहे केदारनाथ जी की रचनाओं में प्रकृति-प्रेम और शोषित वर्ग के प्रति गहरी सहानुभूति दिखाई देती है। उन्हें 'केन का कवि' भी कहा जाता है।
कैफ़ी आज़मी (1919–2002) हिंदी और उर्दू साहित्य के एक अत्यंत प्रतिष्ठित प्रगतिशील कवि और गीतकार थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में सामाजिक चेतना, रूमानियत और क्रांतिकारी विचारों का अनूठा समन्वय किया। 'आवारा सज्दे' उनका कालजयी काव्य-संग्रह है।
जनकवि नागार्जुन (वास्तविक नाम: वैद्यनाथ मिश्र) प्रगतिशील काव्यधारा के मूर्धन्य कवि, उपन्यासकार और गद्यकार हैं। उन्होंने हिंदी और मैथिली (यात्री उपनाम से) में युगीन यथार्थ, जन-आकांक्षाओं और राजनीतिक विद्रूपताओं पर अत्यंत प्रखर, तीखी और व्यंग्यात्मक कविताएँ लिखीं। लोक-जीवन से गहरा जुड़ाव उनकी कविताओं की मुख्य विशेषता है।
भवानीप्रसाद मिश्र आधुनिक हिंदी साहित्य के मूर्धन्य कवि और 'दूसरा सप्तक' के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। आपकी काव्य-शैली अत्यंत सहज, व्यावहारिक और लयबद्ध है, जिसमें बोलचाल की भाषा के माध्यम से गंभीर संवेदनाएँ व्यक्त हुई हैं। 'गीत फ़रोश' और 'बुनी हुई रस्सी' जैसी कालजयी कृतियों के रचयिता मिश्र जी की कविताएँ गांधीवादी दर्शन और मानवीय सरोकारों से गहराई से जुड़ी हैं।
शमशेर बहादुर सिंह आधुनिक हिंदी और उर्दू काव्य-संवेदना के अद्वितीय कवि हैं। 'नई कविता' आंदोलन के प्रमुख स्तंभों में शामिल शमशेर अपनी गहन बिंबधर्मिता, अनूठे सौंदर्यबोध और भाषा-शिल्प के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं।
