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शहर में सूर्यास्त
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है

कविताएँ
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सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' की प्रकाशित कविताओं की एक केंद्रित पाठ-यात्रा।
उन्होंने जनता और ज़रायमपेशा औरतों के बीच की सरल रेखा को काटकर स्वास्तिक चिन्ह बना लिया है
कवि अभिलेख
मगर यह वक़्त घबराए हुए लोगों की शर्म आँकने का नहीं और न यह पूछने का— कि संत और सिपाही में देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कौन है!
वहाँ न जंगल है न जनतंत्र भाषा और गूँगेपन के बीच कोई दूरी नहीं है। एक ठंडी और गाँठदार अंगुली माथा टटोलती है। सोच में डूबे हुए चेहरों और वहां दरकी हुई ज़मीन में कोई फ़र्क नहीं हैं।